ओरछा

16वीं और 17वीं सदी में बुंदेला राजाओं द्वारा बनवाए गये इस नगरी के राज प्रासाद और मंदिर अभी भी अपनी गरिमा बनाए हुए है। इस मध्ययुगीन नगर के पाषाणों पर घनीभूत सौंदर्य ऐसे मुखरित है जैसे समय की शिला पर युगांतर के लिये एक समृद्ध विरासत के रूप में अंकित हो गया हो।

बुन्देला राजपूत प्रमुख रूद्रप्रताप ने बेतवा नदी के किनारे 16वीं सदी में ओरछा राज्य की स्थापना की थी।

ओरछा का स्थापत्य जितना बाहर से भव्य है उतना ही अंतरंग भी बुन्देली शैली थी चित्रकला से सुसज्जित है। यहां के लक्ष्मी नारायण मंदिर में अंकित भित्ति चित्रों में लोक एवं परलोक की गाथाओं का मर्मस्पर्शी चित्रण है।

दर्शनीय स्थल ओरछा के मुक्त प्रांगण में तीन दर्शनीय स्थल है:-

जहांगीर महल
बुन्देली राजपूत रूद्रप्रताप के परवर्ती शासक राजा वीर सिंह जूदेव ने 17वीं सदी में जहांगीर की ओरछा यात्रा की स्मृति में बनवाया था, मजबूत प्राचीरे, सुन्दर छत्रियां एवं पत्थरों में महीन जालियों का काम समूचे स्थापत्य को असाधारण वैभव प्रदान करता है।

राजा महल
अत्यन्त धर्म पारायण, एवं वीर सिंह जूदेव के पूर्ववर्ती राजा मधुकर शाह ने इसका निर्माण कराया था। महल की सादगी इसकी सुन्दर छत्रियां अनायास पर्यटकों को मोहित करती है। राज प्रासाद में आध्यात्मिक विषयों पर जीवंत भित्तिचित्र की अभिव्यक्ति है।

राय प्रवीण महल
कवियित्री और संगीतज्ञ राय प्रवीण, राजा इन्द्रमणि की लावण्यमयी प्रेमिका थी। सम्राट अकबर उसकी बाक्चातुरी पर बहुत प्रभावित हुए । इसी प्रतिभा के फलस्वरूप राय प्रवीण ने सम्राट अकबर के सामने राजा दन्द्रमणि के प्रति अपने पवित्र प्रेम का प्रस्ताव रखा जिसे अकबर ने ससम्मान ओरछा वापस भेजा। यह महल ईटों से बनी दो मंजिला इमारत है। यहां के सुन्दर बगीचे एवं आठ कोणों वाले पुष्पकुंज तथा उपयोगी जल प्रदाय प्रणाली आकर्षणीय है।

राजा राम मंदिर
मंदिर के रूप में रूपांतरित इस प्रासाद के संबंध में जनश्रुति यह है कि र्धम परायण राजा मधुकर शाह स्वप्न में भगवान राम के दर्शन पाकर उन्ही के निर्देश पर अयोध्या से राम की प्रतिमा ओरछा लाये थे। मंदिर में प्रतिष्ठा के पूर्व इस मूर्ति को महल में ही स्थान दिया गया । प्राण प्रतिष्ठा के समय मूर्ति को यहां से हटाना असंभव हो गया तब राजा को यह निर्देश याद आया कि वे जिस जगह पर पहले विराजमान हो जायेंगे फिर वहां से हटाये नहीं जायेंगे। तब से राम राजा वहीं विराजमान हैं। यह देश का अनोखा मंदिर है जहां राम की पूजा राजा की तरह की जाती है।

चतुर्भुज मंदिर
यह वही मंदिर है जिसमें अयोध्या से लाये गये भगवान राम की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा होनी थी। वाध्य अलंकरण के रूप में धार्मिक महल के कमल प्रतीक एवं अन्य मांगलिक चिन्ह अंकित किये गये है।

लक्ष्मी नारायण मंदिर
मंदिर की वास्तु संकल्पना जिसमें मंदिर और दुर्गा शैली का अद्भुत समन्वय है। दीवारों खासकर तीन बड़े कमरों में बने भित्ति चित्रों में अभी भी जीवन का स्पन्दन प्रतीत होता है।

फूल बाग
एक सुन्दर बगीचे के रूप में परिकल्पित यह उद्यान प्रांगण बुन्देला राजाओं से सौन्दर्यबोध की श्रेष्ठता को प्रकट करता है। इसके मध्य भाग में फव्वारों की कतार है जो-जो आठ खंभो वाले प्रासाद तक जाती है। यह भूमिगत प्रासाद ओरछा राजाओं का ग्रीष्मकालीन शीतल विश्राम गृह था। प्रासाद में छत से झरती हुई पानी की बूंदे बरसात का अहसास देती है।

दीवान हरदौल महल
हरदौल वीर सिंह जू देव के पुत्र थे जिन्होंने अपने बड़े भाई जुझार सिंह द्वारा संसय प्रकट करने पर भाभी के प्रति अपनी निश्छल प्रीति प्रकट करने के लिये प्राण उत्सर्ग कर दिये थे। संत स्वभाव वाले हरदौल को इसी उत्सर्ग के कारण देवताओं के समान कीर्ति मिली। बुन्देलखण्ड में आज भी उनकी स्मृति में चबूतरे बने हुए है, जहां ग्रामवासी मांगलिक अवसरों पर हरदौल से मूक आशिर्वाद की याचना करते है।

छत्रियां
बेतवा नदी के किनारे कंचन घाट पर ओरछा के राजाओं की स्मृति में 14 भव्य छत्रियां बनी हुई है।

शहीद स्मारक
भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के समय (1926-1927) आजाद यहां अज्ञातवास में छिपकर रहे। मध्यप्रदेश सरकार ने महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की स्मृति में यह स्मारक निर्मित किया गया है।

छत्रियां
बेतवा नदी के किनारे कंचन घाट पर ओरछा के राजाओं की स्मृति में 14 भव्य छत्रियां बनी हुई है।

अन्य दर्शनीय स्थल
सिद्धबाबा का स्थान, जुगलकिशोर, जानकी मंदिर एवं ओहरेद्वार का हनुमान मंदिर महत्वपूर्ण है।

कैसे पहुँचे

वायु-सेवा : ग्वालियर (119 कि.मी.) एवं खजुराहो (170 कि.मी.) निकटवर्ती हवाई अड्डे है।

रेल-सेवाएं : झांसी (16 कि.मी.)

सड़क-मार्ग : ओरछा, झांसी – खजुराहो मार्ग पर स्थित है, झांसी एवं खजुराहो से नियमित बसे उपलब्ध है।

ठहरने के स्थान : होटल शीश महल एवं बेतवा कॉटेजेस (सभी म.प्र. पर्यटन)

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