जबलपुर

जबलपुर संस्कारधानी के नाम से प्रसिद्ध बारहवी सदी में गोंड़ राजाओं की राजधानी थी। इसके पश्चात् इस पर कलचुरी वंश का अधिकार हुआ। सन् 1817 तक यह मराठों के आधीन रही जिसे ब्रिटिश शासकों ने छीनकर अपनी औपनिवेशक धरों, बैरकों एवं विशाल छावनी केरूप में इस्तेमाल किया। आज जबलपुर एक, महत्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्र, तथा व्यावसायिक गतिविधियों के लिये जाना जाता है।

दर्शनी स्थल

मदन महल फोर्ट
गोंड़ राजा मदन शाह द्वारा 1116 में एक चट्टानी पहाड़ी के ऊपर निर्मित महल जहां से शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।

रानी दुर्गावती स्मारक संग्रहालय

महान रानी दुर्गावती की स्मृति को समर्पित इस स्मारक में एक संग्रहालय है, जिसमें मूर्तियों का संग्रह, शिलालेक एवं प्रागैतिहासिक अवशेष हैं।

तिलवारा घाट :

यह धार अपना विशिष्ट महत्व रखता है। – 1939 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अवशेषों को यहां विसर्जित किया जाकर त्रिपुरी कांग्रेस का सत्र आयोजित किया गया था। घाट के पास ही 12वीं सदी का मालादेवी मंदिर, पिसान हरि, जैन मंदिर, एवं रूपनाथ पर्यटकों के लिये दर्शनीय है।

नर्मदा क्लब
1889 में स्थापित, यह मध्य भारत का सबसे अच्छा क्लव था। यह ब्रिटिश अधिकारियों, सेना अधिकारियों एवं अभिजात वर्ग के भारतीयों का एक हब था। जबलपुर शहर को इस बात का भी गर्व है कि 1875 में स्नूकर नाम के खेल का प्रारंभ यही से हुआ।

कैसे पहुँचे

वायु-सेवा : जबलपुर में हवाई अड्डा है।

रेल-सेवाएं : मुम्बई – हापड़ा मुख्य रेल लाइन पर स्थित है। सभी मुख्य गाडि़यां यहां से गुजरती है।

सड़क-मार्ग : कटनी, रीवा, सतना, सिवनी, छतरपुर, छिन्दवाड़ा आदि स्थानों से नियमित बस सेवायें उपलब्ध है।

ठहरने के स्थान : होटल कलचुरी रेसीडेंसी (म.प्र. पर्यटन) ।

मार्बल रॉक्स, भेड़ाघाट
आकाशोन्मुक्त शांत एवं अनिमेष खड़ी हुई चट्टाने जिसके बीच से कल-कल बहती हुई पुण्य सलिला नर्मदा का अमृत तुल्य जल जिसमें सूर्य की किरणों से खड़ी हुई चट्टानेां का प्रतिबिम्ब उभरता है।

कप्तान जे. फोर्सेथ ने अपनी पुस्तक ’’हाईलैण्ड्स ऑफ सेन्ट्रल इण्डिया’’ में चट्टानों के विभिन्न सौन्दर्य का वर्जन किया है। उन्होने लिखा है कि उनकी आखों ने ऐसा अद्भुत दृश्य कभी भी नहीं देखा।

मार्बल रॉक्स :
किनारों पर सीधे खड़े मैग्नीशियम मिश्रित चूने के पत्थर निर्मल एवं शांत नर्मदा जल को आकर्षक ठहराव प्रदान करते है। यहां पर नवम्बर से मई तक नौका विहार की सुविधा उपलब्ध है। चन्द्रमा की रोशनी में नौकाविहार अत्यन्त ही आनन्दित करता है। लगता है मानो चांदी की जादुई कालीन पर विचरण कर रहे है। नर्मदा का ही एक संकीर्ण नहर जैसा हिस्सा जिसे लोग स्थानीय नाम बंदर कूदनी कहते है बहुत ही आकर्षक है। यहां का संगमरमर अत्यन्त नरम है जिसकों यहां के स्थानीय कलाकार तराशकर विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्ति एवं उपहार की वस्तु तैयार करते है।

धुआंधार प्रपात :
नर्मदा नदी, संगमरमर के बीच से अपना रास्ता बनाते हुए, नीचे की ओर एक प्रपात का निर्माण करती है पानी के गिरने से पानी के कण ऊपर उठकर धुंए जैसे वातावरण निर्मित करते है यहीं वजह है कि इसे धुअंाधार का नाम दिया गया।

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चौंसठ योगिनी मंदिर
पहाड़ी पर स्थित 10वीं सदी के इस मंदिर से दंतपक्तियों के समान संगमरमर के बीच से बहती हुई नर्मदा का अनुपम सौन्दर्य दिखाई देता है। दुर्गा देवी को समर्पित इस मंदिर के विषय में किवदंती है कि इसका एक भूमिगत मार्ग गोंडरानी दुर्गावती महल से जुड़ा है।

कैसे पहुँचे

वायु-सेवा : जबलपुर 23 कि.मी. में हवाई अड्डा है।

रेल-सेवाएं : जबलपुर 23 कि.मी.

सड़क-मार्ग : जबलपुर से सरलता से बसे/टेम्पो उपलब्ध है।

ठहरने के स्थान : मोटल मार्बल रॉक्स (म.प्र. पर्यटन) ।

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