माण्डू – प्रेमगाथा में डूबी आनंद नगरी

माण्डू जीवन के आमोद प्रमोद और पत्थरों में मुखरित प्रेम की अमरगाथा का जीवंत साक्ष्य है, जिसे कवि और राजकुमार बाज़बहादुर ने अपनी प्रेयसी रानी रुपमती के प्रेम की निशानी के रुप में बसाया था। इस नगर की पाषाण प्राचीरों में गहरी प्रेमानुभूति साकार हुई है। आज भी मालवा अंचल के लोक गायक उन विलक्षण प्रेमियों की अमर प्रेमगाथा को गा-गाकर सुनाते हैं और रसिकों को अभिभूत कर देते हैं। यहाँ पर्वत शिखर पर विद्यमान रुपमती का मण्डप आज भी बाजबहादुर के महल को अनिमेष भाव से निहार रहा है। यह मण्डप अफगान वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। समुद्र तल से दो हजार फुट की ऊँचाई पर विंध्य पर्वतमालाओं में बसा माण्डू प्रकृति के विविध सुरम्य रुपों को अपनी वादी में समेटे हुए हैं। इसकी सुरक्षा विशेषताओं के कारण यह मालवा के परमार राजाओं की दुर्ग राजधानी बनी। बाद में 13वीं सदी के अंत में यह मालवा के सुल्तान राजाओं की प्रभाव सीमा में आ चुकी थी। इनमें से पहले ही राजा ने इसे शादियाबाद (आनंद का नगर) के रुप में विख्यात किया। सचमुच ही माण्डू का समूचा परिवेश आनंद और उल्लास से भरा हुआ है। इसके शासकों ने इसी भावना के अनुरुप यहाँ सुन्दर राज प्रासादों का निर्माण किया। जहाज महल, हिंडोला महल, सुंदर आकर्षक नहरें, स्नानागर और भव्य मण्डप जो शांति और समृद्धि के इस काल की भव्यता लिए हुए हैं।

माण्डू का प्रत्येक स्थापत्य वास्तुकला की दृष्टि से एक रत्न है। इनमें विशाल जामी मस्जिद और होशंगाबाद का मकबरा उल्लेखनीय है जिनके निर्माण की भव्यता ने सदियों बाद में ताजमहल जैसी इमारत के महान निर्माताओं को अनुप्रेरित किया था। मुगल शासन काल में माण्डू आमोद-प्रमोद का स्थल था जिसके सरोवरों और महलों में आनंद और उत्सव का वातावरण सदा ही बना रहता था। माण्डू की यही कीर्तिगाथा अमर हो गई, जो उसके राज प्रासादों और मस्जिदों में, जनुश्रुतियों और गीतों में बाद की पीढ़ियों को विरासत में मिली है।

दर्शनीय स्थल
माण्डू के चारों ओर का परकोटा 45 किलोमीटर लंबी दीवार से घिरा है और इसमें 12 दरवाजे हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध दिल्ली दरवाजा है, जो किलेनुमा शहर का प्रमुख प्रवेश द्वार है और जहाँ पहुंचने के लिए अनेक दरवाजों से गुजरना पड़ता है जिनकी मजबूती के लिए दीवारें और मजबूत बुर्ज बनाए गए हैं। इनमें आलम और भांगी दरवाजा प्रमुख हैं, जिन से होकर वर्तमान मार्ग गुजरता है। इसके अलावा रामपोल दरवाजा, जहाँगीर दरवाजा और तारापुर दरवाजा प्रमुख है।

राजसी भवन

जहाज महल :
जहाज की आकृति का 120 मीटर लंबा यह महल दो कृत्रिम तालाबों-मुंज तालाब और कपूर तालाब के बीच दो मंजिलों के रुप में बना हुआ है। संभवत: इसका निर्माण सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने अपने विशाल हरम के रुप में किया था। इसके खुले मंडप, पानी पर झुकते हुए से छज्जे और खुले बरामदे कल्पनाशील राजसी वैभव और उसके मुक्त उल्हास को प्रकट करते हैं। इसके पड़ोस में बने तवेली महल से निहारने पर चाँदनी रातों में इसके छोटे-छोटे बुर्जों और उनके कंगूरों के सौन्दर्य के साथ उनकी छायाएं आनंदविभोर कर देती हैं।

हिंडोला महल :
यहाँ गयासुद्दीन के शासनकाल का एक सभा-भवन है। अपनी ढलानदार दीवारों के कारण यह झूलता हुआ-सा दिखता है। इसी कारण इसे हिंडोला महल कहते हैं। बलुआ पत्थर में निर्मित इसकी सुंदर जालीदार नक्काशी और शानदार ढले हुए स्तंभ दर्शकों को आकर्षित करते हैं। हिंडोला महल के पश्चिम की ओर अनेक अनाम इमारतें अपने पुरातन वैभव और भव्यता की कहानी बयां कर रही हैं। इनके बीच ही खूबसूरत चंपा बावड़ी है, जो ज़मीन के नीचे बनाएं गए मेहराबदार तहखाने से जुड़ी है। जहाँ कभी ठण्डे और गर्म पानी का प्रबंध रहता होगा। इस बस्ती के आसपास वास्तुकला के रोचक नमूनों में दिलावर खान की मस्जिद, नाहर झरोखा, तवेली महल, उजली और अंधेरी बावड़ी तथा गदाशाह की दुकान और घर भी देखने योग्य हैं।

केन्द्रीय समूह

होशंगशाह का मकबरा :
संगमरमर से बनी यह पहली भारतीय इमारत अफगान वास्तुकला के सुंदर नमूनों में से एक है। इसके खूबसूरत डिजाइन वाले आकर्षक गुंबद संगमरमर में तराशी गई बारीक जालियाँ, ड्यौढ़ीदार राजसभा कक्ष तथा आयताकार मकबरे के चारों कोनों पर बनी सुंदर मीनारें बेजोड़ हैं। इसकी रुपाकृति का अध्ययन करने के लिए शाहजहाँ ने चार जाने-माने वास्तुकार यहाँ भेजे थे। इनमें वास्तुकार उस्ताद हमीद भी शामिल था, जिसकी देखरेख में ताजमहल निर्मित हुआ।

जामी मस्जिद :
इसके निर्माण की प्रेरणा दमिश्क में बनी विशाल मस्जिद से ली गई थी। ऊँचे चबूतरे पर बनी इस मस्जिद के बीचोंबीच एक विशाल गुंबदनुमा ड्यौढ़ी बनी हुई है और पीछे की ओर भी अनेक गुंबद बनाए हैं। इस विशाल मस्जिद का सहजतम रुप देखकर दर्शक चमत्कृत हो उठते हैं। मस्जिद का विशाल प्रांगण चारों तरफ विशाल स्तंभों से घिरा हुआ है, जिनकी मेहराबें खूबसूरत और सुरुचि के साथ काढ़ी गई हैं। महराबों, स्तंभों, आलों और गुम्बदों का क्रम भी विविधता लिए हुए है।

अशर्फी महल
‘‘सोने के सिक्कों के महल’’ के नाम से प्रसिद्ध यह महल युवकों की शिक्षा के लिए एक मदरसे के रुप में परिकल्पित किया गया था। इसे होशंगशाह के उत्तराधिकारी मोहम्मद शाह खिलजी ने बनवाया था। आज भी यहाँ कुछ अध्ययन कक्ष अच्छी हालत में मौजूद हैं। यह महल जामी मस्जिद के ठीक सामने बना है। खिलजी ने इस महल के प्रांगण में मेवाड़ के राणा कुम्भा पर अपनी जीत की यादगार में एक सात मंजिली मीनार बनवाई थी, अब इसकी केवल एक ही मंजिल बची है। यहाँ भग्नावस्था में वह मकबरा भी है, जिसे माण्डू की सबसे बड़ी इमारत बनाने का इरादा खिलजी ने किया था। किन्तु जल्दबाजी और आकल्पन की गड़बड़ी की वजह से यह मकबरा ढह गया।

रेवा कुण्ड समूह

रेवा कुण्ड :
बाजबहादुर ने एक सरोवर के रुप में इसका निर्माण करवाया था, जिसमें जल-सेतु की भी व्यवस्था थी, जिससे रुपमती के महल को जलपूर्ति होती रहे। अभी भी सरोवर एक पवित्र कुण्ड के रुप में स्थित है।

बाज़बहादुर का महल :
सोलहवीं सदी के आरंभिक काल में बाज़बहादुर द्वारा निर्मित इस महल की अनूठी विशेषताएं है। इसका विशाल प्रांगण चारों और भव्य कक्षों से घिरा है, जिनके ऊँचे छज्जों से आस-पास के ग्राम्य दृश्यों की नयनाभिराम छवियाँ मन को मोहती हैं।

रुपमती का मण्डप :
यह मण्डप विशेष रुप से सैनिक निगरानी केन्द्र के रुप में बनाया गया था। गिरि शिखर पर निर्मित यहाँ दो मण्डप हैं, जो रानी के एकान्त आश्रयवास थे। जहाँ से वह बाजबहादुर के महल को निहारती थी और सुदूर नीचे बहती हुई नर्मदा के सौन्दर्य का पान करती थी।

अन्य स्मारक :
माण्डू में और भी बहुत से स्मारक हैं जो किसी समूह में नहीं आते किंतु पर्यटकों के लिए उनका आकर्षण किसी भी प्रकार से कम नहीं है।

नीलकण्ठ :
भगवान शिव के पवित्र आश्रय के रुप में स्थापित पर्वत की गहराई में बना यह मंदिर श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र है। इस घाटी का समूचा परिवेश अत्यंत रमणीय है। वृक्षों की घनी और सुंदर छाया के बीच यहाँ एक कुण्ड है, जिसमें पहाड़ी झरने से पानी आता है।

नीलकण्ठ महल :
नीलकण्ठ के पास ही महल का निर्माण मुगलकाल के मुस्लिम गवर्नर शाह बादशाह खान ने सम्राट अकबर की हिन्दू पत्नी के लिए किया था। यहाँ की दिवारों पर अकबर के समय के कुछ ऐसे शिलालेख हैं जो सांसारिक वैभव और समृद्धि की निस्सारता की ओर संकेत करते हैं।

हाथी महल, दरयाखान का मकबरा, दाई का महल, दाई की छोटी बहन का महल, मलिक मुगिथ की मस्जिद और जाली महल भी माण्डू के अन्य आकर्षक स्मारक हैं। इनके अलावा प्रतिध्वनि बिंदु भी माण्डू का एक बहुत बड़ा आकर्षण है। यहाँ हमारी आवाज की गूंज और फिर उसकी अनुगूंज बड़ी देर तक हमें ही सुनाई देती रहती है।

लोहानी गुफाएँ और अनेक मंदिरों के भग्नावशेष भी जो राज परिसर से अधिक दूर नहीं हैं, यात्रियों के लिए दर्शनीय हैं क्योंकि माण्डू के इतिहास से ये स्मारक गहरा संबंध रखते हैं गुफाओं के सामने ही अस्ताचल बिंदु है, जहाँ से सुहानी शाम में माण्डू के ग्रामांचलों और इसके सुरम्य परिवेश को आनंदपूर्वक देखा जा सकता है।

कैसे पहुँचे :
कान्हा नेशनल पार्क के जाने के दो मुख्य मार्ग हैं-खटिया (किसली से 3 कि.मी.) और मुक्की, जबलपुर से चिरईडोंगरी के रास्ते किसली 165 कि.मी. पड़ता है और मोतीनाला और गढ़ी के रास्ते मुक्की 203 कि.मी. है। मुक्की राज्य मार्ग संख्या 26 पर होने से अधिक सुविधाजनक है और बिलासपुर (182 कि.मी.), रायपुर (213 कि.मी.) और बालाघाट (83 कि.मी.) से यहाँ पहुँचना सरल है। नागपुर नैनपुर और चिरईडोंगरी के रास्ते किसली 159 कि.मी. और बालाघाट के रास्ते 289 कि.मी. है।

वायु-सेवा : सबसे नजदीकी हवाई अड्डा इंदौर (99 कि.मी.) है।

रेल-सेवाएं : मुंबई-दिल्ली मुख्य मार्ग पर रतलाम (124 कि.मी.) एवं इन्दौर (99 कि.मी.) है। सभी मेल, और एक्सप्रेस गाड़ियां रतलाम और इंदौर रुकती हैं।

सड़क-मार्ग : मांडू के लिए इन्दौर, धार, महू, रतलाम, उज्जैन और भोपाल से नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं।

अनुकूल मौसम : जुलाई से मार्च। मानसून का मौसम तो यहाँ आने के लिए सर्वश्रेष्ठ है।

ठहरने के स्थान : मालवा रिसोर्ट (मध्यप्रदेश पर्यटन), मालवा रिट्रीट (मध्यप्रदेश पर्यटन)

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